सिंगरौली। प्राप्त जानकारी के अनुसार एनसीएल निगाही परियोजना के तुरा फेस में 20 क्यूबिक मीटर क्षमता वाली P&H शॉवेल के जलमग्न होने की घटना ने परियोजना की मानसून तैयारी और सेफ्टी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोयला उत्पादन में अहम भूमिका निभाने वाली मशीन के पानी में डूबने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मानसून से पहले आखिर कितनी तैयारी की गई थी?
सूत्रों के अनुसार हर साल मानसून प्रिपरेशन के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। जल निकासी, नालियों की सफाई, पानी के डायवर्जन और संभावित जलभराव वाले क्षेत्रों की पहचान के लिए योजनाएं बनती हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि यदि तैयारी पूरी थी तो तुरा फेस में इतना पानी कैसे जमा हुआ कि करोड़ों की शॉवेल जलमग्न हो गई?
*महाप्रबंधक राजेंद्र वर्मा की निगरानी में सेफ्टी व्यवस्था कितनी प्रभावी?*
यह सवाल भी अब चर्चा में है। परियोजना में सेफ्टी को लेकर नियमित निरीक्षण और मॉनिटरिंग के दावे होते हैं, लेकिन मौके की तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है। क्या सेफ्टी केवल कागजी कार्रवाई और पेपरवर्क तक सीमित है?
परियोजना अधिकारी यानी PO की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मानसून से पहले क्या जलभराव वाले स्थानों का वास्तविक निरीक्षण किया गया था? पानी के संभावित स्रोत की पहचान हुई थी? यदि हुई थी तो उसे रोकने या डायवर्ट करने की व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई?
जानकारों का कहना है तुरा फेस से कोयला उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। ऐसे में यहां संचालित शॉवेल का जलमग्न होना केवल मशीन के नुकसान का मामला नहीं, बल्कि उत्पादन और सार्वजनिक संपत्ति से जुड़ा गंभीर विषय है।
*अब बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी चूक के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी?*
छोटी गलतियों पर कर्मचारियों से जवाब मांगने वाले प्रबंधन के सामने अब करोड़ों की मशीन के जलमग्न होने पर जवाबदेही तय करने की चुनौती है।
क्या मानसून प्रिपरेशन पर हुए खर्च की जांच होगी? क्या पिछले वर्षों के बारिश के आंकड़ों और इस वर्ष की तैयारी का मिलान किया जाएगा? कहीं लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए ,क्या विजिलेंस स्तर पर जांच होगी? इन सवालों के जवाब अब निगाही प्रबंधन को देने होंगे।
मामले में प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।







